जब से यह योजना शुरू हुई है इसपर चर्चाओं व बहसों का बाजार गर्म है । कुछ समीक्षक इसे सरकार की एक अच्छी व सकारात्मक पहल बता रहें हैं तो विरोध की आवाजें भी कम नहीं । सत्तापक्ष आज से ही अपनी पीठ थपथपा रहा है तो विपक्ष इसे अपनी योजना बताकर श्रेय देने की मांग कर रहा है । कुछ लोग इसमें देश का भला देख रहे हैं तो कुछ इसे एक बकवास योजना बता रहे हैं । परन्तु बहुत कम लोग होंगे जिन्होंने इस बात पर चर्चा या बहस की कि इस योजना को कैसे सफल बनाया जा सकता है, इस योजना के रास्तों में क्या बाधाएँ हैं और उनपर हम कैसे और किस सीमा तक विजय पा सकते हैं।
हो सकता है कुछलोगों को मेरी बात अच्छी ना लगें और कई बातें लोग कहेंगे । परन्तु किसी विद्वान ने कहा है कि शासक यदि कर्मठ हो तो उसे सही सलाह देना उचित ही नहीं आपका धर्म भी है परन्तु अगर मूक हो तो यह आपकी मुर्खता है ।
हमारी सकरात्माक चर्चा व बहस निश्चित रूप से लाभ पहुँचाती है । यह योजना निश्चित रूप से पुरानी है और विगत सरकार की देन है जिसे नई सरकार ने नई ऊर्जा व कलेवर के साथ पेश किया है । परन्तु उस पढाई का क्या मतलब जिसका परिणाम ही फेल की श्रेणी में हो । नई सरकार भी बिना परिणाम आए खुशी मना रही है ।
वित्तीय समावेशन के नाम से पहले से चलाई जा रही योजना का ही नया नाम व स्वरूप है जन-धन योजना । इस योजना को सफल बनाने के लिए कई प्रयोग किये गए जिनमें अधिकांशतः फेल हुए । योजना को धरातल पर लाने व सफल बनाने के लिए जो बदलाव हुए, कहीं ना कहीं उनको बदलने वालों ने धरातल पर जाकर योजना कि खामियों को पहचानने की कोशिश नहीं की । पहले डाकघर बाद में बिजनेस फ़ैसलिटेटर फिर बिजनेस कारेसपौंडेण्ट ।
इस योजना को सफल बनाने के लिए सरकार ने डाकघरों को सबसे पहले चुना क्योंकि यही वो एक मात्र साधन था जिसकी पहुँच दूर-दराज के गाँव तक थी । लोगों का खाता खोला जाने लगा । डाकघरों में लोगों की भीड़ इकठ्ठी होने लगी । जल्दी ही, जितनी तेजी से लोगों की भीड़ आई थी उतनी ही जल्दी लोगों का मोहभंग हो गया । कारण था इन डाकघरों में संसाधनों की कमी, जो गाँव की बड़ी जनसंख्या को नहीं सम्भाल सकती थी । एक तरफ पैसों के लिए ये डाकघर जहाँ बडे डाकघरों पर आश्रित थे वहीं दूसरी तरफ इनमें काम करने वालों की संख्या भी कहीं एक तो कहीं दो तो कहीं वो भी नहीं होती। फलतः लोगों को जमा-निकासी में अत्यधिक कठिनाई होने लगी और लोगों ने खाता खुलवाना व डाकघरों में पैसा रखना दोनों ही बंद कर दिया । साथ ही खाता खुलवाने के लिए लगने वाले प्रमाण पत्रों के कठोर नियम ने ग्रामीणों को और ज्यादा हतोत्साहित किया ।
इन सभी बिन्दुओं को ध्यान में रखते हुए सरकार ने बिजनेस फ़ैसलिटेटर को इस योजना में शामिल किया । ये बैंकों द्वारा चुने गए एक प्रकार के एजेंट होते थे जिनका काम लोगों को बैंक के साथ जोड़ना होता था । ये लोगों को खाता खुलवाने व जमा-निकासी में उनकी सहायता करने के साथ-साथ अन्य बैकिंग कार्यों में भी उनकी मदद करते । इस काम के बदले उन्हें बैकों से कमीशन दिया जाता था जोकि उनके आय का साधन होता । परन्तु जल्द ही इस व्यवस्था को लेकर भी शिकायतें आने लगी । बिजनेस फ़ैसलिटेटरों पर पैसों का गबन करने व लोगों को बेवजह परेशान करने के आरोप लगने लगे । लोगों की नज़रों में इनकी पहचान बिजनेस फ़ैसलिटेटर की जगह दलाल की बन गई, जो हरेक काम के लिए उनसे पैसे एँठता था । बिजनेस फ़ैसलिटेटरों के भी अपने तर्क थे । इनके अनुसार, इन्हें बैकों से इतना कम कमीशन मिलता कि उससे जीवन गुजारना भी बहुत कठीन था और जो कुछ भी मिलता समय पर नहीं मिलता । उनके बातों में सच्चाई हो सकती है पर गलत तो गलत है । उसे जायज नहीं ठहराया जा सकता । आम जनता का इन सब बातों से क्या लेना देना । बैंकों ने इन सब सतही समस्याओं को समझने व समाधान ढूढनें के बजाए अपनी साख बचाने के लिए धीरे - धीरे इन बिजनेस फ़ैसलिटेटरों से दूरी बना ली और नई नियुक्तियाँ लगभग बंद कर दी । सरकार की इस महत्वाकान्क्षी योजना में बैंकों की रूची भी शुरू से ही संदेहास्पद रही है और लगता रहा है कि बैंक सरकार से सच्चाई छुपाते रहे हैं । हालांकि विगत कुछ वर्षों में काफी बदलाव आया है ।
इस प्रारूप को विफल होता देख सरकार ने बैकों से नए प्रारूप हेतु सुझाव माँगा । नतीजन आरबीआई के देखरेख में बीसी ( बिजनेस कारेसपौंडेण्ट ) प्रारूप को लागू किया गया । तय हुआ कि सभी बैंक बिजनेस कारेसपौंडेण्ट नियुक्त करेंगे, जो कि ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर अपने बैंकों के ग्राहक सेवा केंद्र (सीएसपी) खोलेंगे और उनके संचालन में बैंक के साथ मिलकर सहयोग करेंगे । इसके लिए आरबीआई ने सभी बैंकों को उन गाँवों की सूची सौंपी जहाँ उन्हें अपना ग्राहक सेवा केंद्र खोलना था । शुरू के दिनों में दस हजार की जनसंख्या पर एक केंद्र खोलने की योजना बनी, जिसे अब दो हजार कर दिया गया है। शुरू के दिनों में इन केन्द्रों को खोलने की रफ़्तार काफी धीमी रही । हालांकि दक्षिण के कुछ राज्यों में यह काम तेजी के साथ हुआ । यूपीए की सरकार आने पर चिदंबरम साहब ने योजना की समीक्षा की और बैंकों को यह स्पष्ट निर्देश दिया कि इस योजना को पूरे देश में धरातल पर लाने में कोई भी कोताही बर्दाश्त नहीं की जाएगी । सभी बैंक यथाशीघ्र अधिक से अधिक बीसी की नियुक्ति करें और उपलब्ध सूची के अनुसार ग्राहक सेवा केंद्र खोलें । यह भी तय हुआ कि यदि कोई बैंक एक निश्चित समय सीमा के अन्दर उससे सम्बंधित सूची के अनुसार केंद्र खोलने में असफल होता है तो उसे दूसरे बैंक को सौंप दिया जाएगा । केंद्र के इस सख्त रवैये का असर ये हुआ कि बीसी निरंकुश हो गए और बैंकों ने लक्ष्य पूरा करने के लिए सब जानते हुए भी आँखें बंद रखीं हैं । यहाँ तक की सूची से इतर भी केंद्र खोले जा रहे हैं । इस मॉडल में आज भ्रष्टाचार का बोलबाला है । आप जहाँ चाहें सीएसपी खोल सकते हैं बस बीसी को मोटी रकम थमाईए । सूची से इतर केंद्र खुलने के कारण इन्हें सरकार द्वारा मिलने वाले मासिक आर्थिक सहयोग से वंचित रहना पड़ता है । बीसी द्वारा सीएसपी संचालकों का शोषण अन्य कई तरीकों से भी जारी है । अगर बीसी व सीएसपी संचालकों के बीच होने वाले एकरारनामें को देखें तो कई बातें सामने आती हैं । आरबीआई द्वारा तय नियमों को धता बताते हुए बैंक केवल अकाउण्ट अपलोडिंग तक सिमित रह गया है । सीएसपी व्यवसाय से बनने वाले कमीशन का एक निश्चित हिस्सा बीसी यह कहकर रखलेते हैं कि उनके द्वारा दी जाने वाली विभिन्न सर्विसों के बदले यह पैसा रखा जाता है । कमीशन देने में भी पारदर्शिता का घोर अभाव है । पर इन सब बातों को कोई सुनने, देखने व जानने वाला नहीं । हद तो ये है कि बीसी केन्द्रों को भ्रष्टाचार के लिए सुझाव देते हैं और पकडे जाने पर अपना पल्ला झाड़ते हुए सारा दोष इनके सर मढ देते हैं । खाता खोलने के लिए लिया जाने वाला पैसा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है । रोज कई मामले आ रहे हैं । ग्राहक लाचार हैं ।
जनधन योजना ने तो जैसे बहार ला दी है । बीसी जहाँ इन आरोपों को खारिज करते हैं वहीं केंद्र संचालकों के पास इनके खिलाफ शिकायतों की ढेर व साक्ष्य हैं ।
ग्राहकों के पास भी शिकायतों की लम्बी फेहरिस्त है । इनकी सुनने वाला भी कोई नहीं । कई कामों के लिए लोगों को केंद्र से लिंक ब्रांच तक कई चक्कर लगाने पड़ते हैं फिर भी काम हो जाने की संभावना नहीं होती । इन केन्द्रों के लिए तत्कालीन आवश्यक्ताओं के आधार पर वर्षों पहले तय की गई सीमाएँ आज अनुपयोगी व सबसे बड़ी बाधक हैं । इन सभी कारणों से ग्राहक इन केन्द्रों पर जाने से कतराते नजर आते हैं या फिर मजबूरी में जाते हैं । फलतः इन खातों में पैसे भी कम ही रखे जाते हैं । इन केन्द्रों पर प्रयोग होने वाली बैकिंग प्रौद्योगिकी व सुविधाओं का स्तरीय व आवश्यकतानुसार ना होना भी लोगों के लिए परेशानी का सबब है । बैंकिंग साफ्टवेयर को अपडेट करने की आवश्यकता है । अगर ग्राहकों को कहीं पैसा भेजना होता है तो इन केन्द्रों पर कमीशन के तौर पर मोटी रकम कट जाती है जो कि बैंकों से काफी अधिक है, जिससे इन केंन्द्रों की विश्ववसनियता व व्यवसाय दोनों प्रभावित होते हैं। लोगों को लगता है कि इससे अच्छा है किसी नजदिकी शाखा में चले जाएँ । इन सब छोटी छोटी दिखने वाली मूल चीजों में सुधार करना होगा ।
केंद्र व राज्य सरकारों ने प्रशासनिक स्तर पर भी कई निर्देश दिए थे । परन्तु आज भी इस स्तर पर कार्य शुन्यता दिखती है ।
नई सरकार को चाहिए कि इस माडल पर विचार करे और जमीनी रोड़ों को हटाए । अगर इसपर गंभीरता से सभी बिन्दुओं व सभी पक्षों के साथ चर्चा व विचारमंथन किया जाए तो ग्राहक सेवा केन्द्र बहुत ही प्रभावशाली सिद्ध हो सकते हैं ।