Saturday, September 17, 2011

कौन कहता है कि "कमासूत पूत की ही पूछ होती है" : व्यंग्य

मैंने अक्सर लोगों को ये कहते देखा है कि "कमासूत पूत की ही पूछ होती है" । पर आपको जानकर खुशी होगी कि हमारे यहाँ ऐसा नहीं होता, ना ही हम किसी को इसका मौका देते हैं कि राज्य सरकार या केन्द्र सरकार को इसके लिए शर्मींदा होना पडे । मैं आपको ये साबित कर सकता हूँ ...मेरा परिवार लगभग 33 लाख लोगों का है । इतने बडे परिवार को चलाने के लिए हमने दो सांसद और आठ बिधायक चुने हुए हैं । फिर भी देखिए, आज पूरे राज्य में शायद मैं ही एक मात्र हूँ जिसे राष्ट्रीय राजमार्ग की कोई आवश्यकता नहीं । ये अलग बात है कि मैं अपने राज्य की अर्थव्यव्सथा में प्रमुख हिस्सेदारी देता हूँ । राज्य का सीमावर्ती जिला और रेलवे स्टेशन मेरा है, फिर भी ना यहाँ से कोई ट्रेन खुलती है और ना हीं कई अच्छी-नामी ट्रेनों का ठहराव है । वाराणसी रेल मंडल को बिहार से सबसे अधिक राजस्व मैंने दिया है और शायद आज भी दे रहा हूँ ... परंतु अगर ये सारी सुविधाएँ मुझे ही मिल जाएँगी तो क्या लोग नहीं कहेंगे कि "कमासूत पूत की ही पूछ होती है" ? बिजली वितरण में भी हमारी हिस्सेदारी ना के बराबर है जबकि पडोसी गोपालगंज को औसत 12 घंटे बिधुत वितरण होता है । गोपालगंज के साथ साथ एक और पडोसी छ्परा को भी फोर लेन राष्ट्रीय राजमार्ग का तोहफा सरकारों ने दे दिया है । मुझे दु:ख है इस बात का कि मेरे लाख समझाने के बाद भी इन सुख सुविधाओं के लालच में मेरे कुछ पूतों ने अपने कारखानों, मिलों और उद्दोगों को बंद कर दिया । मेरा परिवार के पैसों से आज सारे बैंक खचाखच भरे हुए हैं ... फिर भी हम सम्मान, इज्जत और सुविधा की माँग नहीं करते इनसे । गाहे बगाहे कुछ मिडिया के लोगों ने हमें बदनाम करने की कोशिश जरूर की और करते हैं कि हम इस एवज में अपनी पूछ चाहते हैं पर भला हो उन सभी का जिन्होंने इनकी बातों को तवज्जो नहीं दी और हमारी प्रतिष्ठा बचाए रखी ...राज्य व केन्द्र सरकारों के मंत्रीमंडल में हमेशा मेरे सपूतों ने बढ चढ कर हिस्सेदारी की है, परंतु अपने घर के लिए कभी कुछ ऐसा नहीं किया कि लोग हमारे उपर ऊँगली उठाए और कहें कि वो सीर्फ अपने परिवार को देखते हैं ... इन सपूतो ने हमेशा अपने मुखिया और नेता होने का धर्म बिना किसी पक्षपात के सदैव निभाया है ... देश का प्रथम राष्ट्रपति हमारा ही सपूत था पर प्रथम प्रधानमंत्री आदि की तरह उनके घर और उनके ख्याति के लिए कुछ भी ना करने पर भी हम खुश हैं ... आए दिन राज्य के हर कोने के लिए योजनाओं की धोषणा होती है, पर मैं कभी भी कहीं भी नहीं होता ... मुझे इसमें शामिल होना बिल्कुल अच्छा नहीं लगता है । मैं तो संत हूँ, जो भी कुछ भीक्षा में मिल जाता है, उसी में संतुष्ट रहता हूँ ... आप सबसे बस यही प्रार्थना है कि मेरे लिए दुखी ना हों ... मेरे लिए आप सरकार को पक्षपाती बनने पर बिवस ना करें ... हमारे परिवार में सभी कमासूत हैं और इतना जरूर कमा लेते हैं कि अपना पॆट भर लें और दूसरे परिवारो को भी सहायता करें ... अपने हक की बात करके आप दूसरे बेकार परिवारों का हक ना छीनें ... वो भी हमारे भाई-बहन हैं ... "कमासूत पूत की ही पूछ होती है" जैसी कुप्रथा को समाप्त करने के लिए अपनी आहुति दें ...

आपका जिला
सिवान

**** व्यंग्य लिखने की प्रथम कोशिश ... कमियों व त्रुटियों के लिए क्षमाप्राथी हूँ ****

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